" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

वो सर्दी की एक रात


वो सर्दी की एक रात
एक मोटी रज़ाई
मिली जुली गरमाहट
मन में कुछ यादों के साये
बस तेरे अक्स को समाये

कुछ उछलते सवाल
जो मैंने तूझे कभी पूछे नहीं 
वो अनकही बातें
जो तूने कभी सुनी नहीं


कुछ टूटी कसमें
जो हमने साथ खाई थी
मेरी इक़रार भरी गज़लें
जो कभी मैंने तूझे सुनाई थी

वो प्रीत के गीत
जो कभी हमने गुनगुनाएँ थे
वो गुलाब के फूल
जो मैंने तेरी किताब में छुपाए थे

वो तेरी साँसे
जो मेरा कमरा महका देती थी
वो हया वो मासूमियत
जो मुझे दीवाना बना देती थी

वो तेरा बदन जैसे कचनार कली
वो तेरी आवाज़ जैसे कोयल चली
वो तेरी आँखें जैसे छैनी कटार
वो तेरी पायल की झंकार
जैसे गावे कोई मेघ-मलिहार
वो तेरे होंठ जैसे सूरा प्याला
वो तेरे ......
वो ते... तभी
कुछ दिमाग में 
तमतमाहट का मौसम 
"ये "तू" कौन ?? वो बेवफ़ा ????"

कुछ अज़ीब सी कशमकश
बदन , न हिले न डुले
जबान को शब्द ना मिले
"बस वो थोड़ी ज़िद्दी थी , बेवफ़ा नहीं "
दिल ने मुझे कुछ यूँ दिलासा दी
आंसुओं ने बिस्तर भिगोया
और
रात करवटों में खो गईं ||



ताउम्र कोसता रहेगा , हाथ लकीरों को :(


ताउम्र कोसता रहेगा , हाथ यूँ लकीरों को ><
क्यूँ लकीरों को, हाथ में 'वो' रास ना आयी :( 




हुस्न तेरा ए सनम :)



नैनों में बसे उसके चाकू , छुरी , खंजर सारे ,
देख ले बस एक नज़र , तो कत्ल-ए-आम कर जाएँ |

लबों से महज़ छू ही ले वो एक बारगी भी प्याला ,
तो सच्ची , सादा पानी  भी ज़ालिम शराब बन जाएँ ||

अधरों पे चंचल मुस्कान और वो तराशा हुआ साँचा ,
ख़ुद ही समझ जाओगे , परवाना क्यूँ शमा में जल जाएँ |

वो रेशम सी जुल्फें , कुछ अपने में उलझी हुई ,
उलझे उलझे से ख़ुद हम , बस अरमान मचल जाएँ ||

"हुस्न ख़ुद इससे हैं ",तारीफ में और क्या लिखते "मनसा"
ये  तो वो महक हैं , फिज़ाएँ ख़ुद जिससे महकती चली जाएँ ||



किसे जलाये - रावण को या राम को ????

   

"दशहरा"

एक विजय उत्सव 
अच्छाई पे बुराई का |
या 
एक शर्मसार दिन 
 संदेश जिसका पति से बेवफ़ाई का ||


नहीं पता मुझको 
शायद तुमको भी नहीं |
ये दिन
याद दिलाता हैं मुझे 
मिले जो 
"दर्द"
 और बस दर्द    
सीता को 
 पति से वफ़ाई पे ||


  कौन था ? 
असली गुनहगार
"रावण"
एक राक्षस होके 
जो यूं अपनी जात दिखा पाया |
 अंहकार में परस्त्री को उठा ले आया ||
या 
"राम"
जो अंतर्यामी होके भी 
अपनी पत्नी पे विश्वास न कर पाया |
 चरित्र पे शक कर वनवास छोड़ आया ||

यूं इतने दिन 
पाक चरित्र 
रख के भी 
क्या पाया उस बेचारी ने |
इस से अच्छा होता अगर 
एक रात 
रावण के संग 
सो ली होती |
तो पूरी ज़िंदगी 
रनिवासों में जी ली होती ||
पर नहीं 
नहीं 
उसे तो अपने
पति-परमेश्वर की पड़ी थी |
उन्हीं के संग 
चलने-जीने का 
संकल्प
ले चली थी || 
पर हाय रे उसकी 
फूटी किस्मत ,
उस मर्यादा पुरुषोत्तम 
ने मर्यादायों में 
घृणा के अलावा
उसे कुछ न दिया ||


अब तुम बताओ 
किसे जलाना चाहिए आज ???
उस "रावण" को 
जिसने 
एक अनजान औरत 
के 
हुस्न-प्रेम 
में अंधे होकर 
पूरी दुनिया को दुश्मन बना लिया |
मौत को खुद निमंत्रण थमा दिया ||
या 
उस "राम" को 
जिसने अपनी 
तथाकथित "सब कुछ" 
अर्धांगिनी 
को भोग-शक का शिकार बना दिया |
 पूरे जमाने में उसका परिहास बना दिया ||  

|| मनसा ||

दशहरा की हार्दिक शुभकामनायें 




मुबारकबाद ,मेरे जन्मदिन पे



                       जाने क्यूँ दे रहे ,लोग मुबारकबाद ,मुझे मेरे जन्मदिन पे "मनसा" |
                       ये दिन तो हर दफा , मेरी हयात का एक साल वजा कर देता हैं || 


#हयात - जिंदगी
#वजा - कम करना 


'मोहब्बत' पेशा नहीं होता


  वो बेवफा आज फिर लौट आई हैं मुझमें ही सिमट जाने को |
  अरे कोई उस नादाँ को समझाए ,'मोहब्बत' पेशा नहीं होता ||



बहना को देता आशीष नज़र आऊँ :)




राखी के हर धागे का कर्ज़ मुझपे ,
कभी उससे न मुकर जाऊँ |

आज़ हूँ भले उससे दूर कितना ,
दिलों में कभी दूरी न मगर पाऊँ ||

न मिले प्रेम उसका,सुनी रहे कलाई 
कभी ऐसी मैं न सहर पाऊँ |

प्यारी बहना जो लिखी तूने नसीब में ,
ख़ुदा हर जन्म ऐसी तेरी महर पाऊँ |

खुशियाँ मिले उसे सारे जहाँ की ,
उसके चेहरे पे हरदम खुशी की लहर चाहूँ ||

कभी छू न सके कोई दर्द उसको ,
भले बदले , मैं जहन्नुम  द्वारे उतर जाऊँ ||

ऐ मौला , बस अता कर ऐसी ज़िंदगानी मुझको ,

जब भी याद करें वो मुझको ,
पास उसके मैं  देता आशीष नज़र आऊँ || 


|| मनसा ||





क़यामत से मुलाक़ात.न...


नींद  में  होती  हैं , क़यामत  से  रोज़  मुलाक़ात.न  मेरी  |
ख्वाबों  में  सनम  मेरी ,  बेनकाब  जो  निकलती  हैं   || 


|| मनसा  ||




वो स्कूल का गुज़रा ज़माना ||



वो कन्धे पे बस्ता और हाथों में बोतल ले जाना |
मुझे  बहुत याद आता  हैं वो स्कूल का ज़माना ||

वो स्कूल जाने को रिश्वत में पापा से चॉकलेट पाना |
सुबह सुबह स्कूल जाने को मम्मी का मुझे सजाना ||

interval  में  बैठ कर  वो लंच  सबके  साथ  खाना  |
'मेरी मम्मी के पराँठे सबसे  अच्छे' सबको बताना ||

कक्षा में  मुझे बातें करते  देख मैडम  का आंखे  तिमतिमाना |
फिर girl -boy- girl  sitting  की हसीन  पनिसमेंट पाना ||

वो पेनों की  लड़ाई और  हाथों  से चिड़िया  उड़ाना |
नोटबुक के पीछे क्रॉस v/s ज़ीरो गेम का पाया जाना ||

वही कहीं मिलती थी साइलेंट क्लास में बातों के लिए लिखाई |
दोस्त का लिखा crush का नाम ,फिर उसपे ज़ोरों से पेन घिसाई ||

आगे  वाली छोरी की वो बड़े ज़ोर से चुटिया घुमाना |
रूठ भी जाए तो प्यारी सी मासूमियत से उसे मनाना ||

एक्जाम में answer same होने पे मास्टर का चिल्लाना |
"गधे  सवाल भी तो same था " दिल  से  आवाज़ आना ||

घंटी की आवाज़ सुनते ही ज़ोर से हल्ला मचाना |
छुट्टी  की घंटी  पे मैडम  से पहले निकल जाना ||

बारिश   के  दिनों में  वो  कश्तियों  की  रेस  लगाना |
पत्थरों को ठोकर मारते , हाथों में हाथ लिए घर जाना ||

कभी  रोते तो  कभी यूँ  ही  हँसते  मार सह  जाना |
कुछ  ऐसा  ही  बिगड़ैल  था  मेरे स्कूल  का  ज़माना ||

अब ना मिलती हैं पापा से रिश्वत , न लंच में मम्मी के पराँठे |
ना  नोटबुक के गेम बचे , न पड़ती अब मैडम ज़ी की डांटे ||
पानी  बदल गया बोतल का , crush भी अपना न रहा ,
वक़्त ने अब छीन लिया मुझसे वो खुशियों का खज़ाना ||
सच  में  जब  भी पढ़ता हैं  दिल हमारा  अतीत   पुराना |
आंखो में अश्क ला देता हैं वो स्कूल का गुज़रा ज़माना ||


||  मनसा  ||


किसी और की हो नहीं पाएगी वो ||



मुझे भूलने का दावा कर रही  ,
मगर मेरे वज़ूद को अपने में खो नहीं पाएगी वो ||

मेरी पागलों सी दीवानगी पे हँस रही ,
मगर रात को नैनों में लिए अश्क़ सो नहीं पाएगी वो ||

मुझसे दूर जाने को बेताब दिख रही ,
मगर फिर खुशियों को अपने संग पिरो नहीं पाएगी वो ||

"शायद किस्मत को यही मंजूर" कह रही ,
मगर अपनी लकीरों से मेरा प्यार धो नहीं पाएगी वो ||

"मुझे नहीं मालूम , क्या मज़बूरी , क्या शिकायत हैं उसको मुझसे "

बस मुझे खबर हैं अपनी मोहब्बत से इतनी ,
मुझसे ज़ुदा होके  किसी और की हो नहीं पाएगी वो ||


    || मनसा || 



जरा इन्हें भी देख लीजिये  >>




...दिल में कसक आज़ भी हैं ||




                            तेरे आलिंगन में धडकनों को मिली थी जन्नत ,
                                                               मेरी साँसो में उसकी सिसक आज भी हैं |
                            अलविदा कहते जो छूए थे तूने लब मेरे ,
                                                         मेरे होंठो पे तेरे होंठो की खिसक आज़ भी हैं ||
                            ख़्वाहिश तो थी लिखने की पूरी किताब तेरे हुस्न के जलवों पे ,
                            पर तेरी बेवफ़ाई ने मेरी कलम को उठने न दिया , 
                                                                     दिल में इसकी कसक आज़ भी हैं ||

|| मनसा ||


जरा इन्हें भी देख लीजिये  >>

...क्या मुझे प्यार का सलीका भी नहीं आया था ???



जब उसने कहा था मुझसे , मैं चाहती हूँ किसी और को ,
"तुम्हारी खुशी सबसे ऊपर है मेरे लिए" शब्द बस इत्ते ही निकाल पाया था |

लिखा था उसका नाम कमरे के हर कोने में , चूमता था हरदिन उन्हे ,
गम की उस रात , मैंने हर नाम को चूम चूम के मिटाया था ||

कल शादी थी उसकी , बुलाया नहीं था उसने , मैं गया फिर भी ,
जिन हाथों से देता था तोहफा , उन्हीं से बरातियों का सोफा सजा के आया था ||

मुझे तो गिला भी नहीं की आज उसे मैं याद भी न रहा ,
उसकी मोहब्बत में , मैं भी तो सारे जहाँ को भुला के आया था ||

उससे तो मैं बेवफाई का हिसाब माँगने क़ाबिल भी न हो सका ,
उसके इश्क़ के आगोश में , मैं भी तो कई दिल तोड़ के आया था ||

बस एक ख़याल ने उसकी मोहब्बत में ज़ान फ़ना होने से बचा ली ,
उसे शायद मिल जाए दूजा ,पर माँ को मैं बड़ी मन्नतों से मिल पाया था ||

जिनकी चाह था मैं ,उन अपनों को छोड़ भागा था मैं उस गैर के पीछे ,
लोग कहते हैं ," मनसा " तूझे तो प्यार का सलीका भी नहीं आया था ||

मैं , मेरा बचपन और मेरी माँ || (^_^) ||







ज़ब कभी मैं फुर्सत के पलों में शीशा देखता हूँ |
अपने अक्स में खिलखिलाते एक बच्चे को देखता हूँ ||

एक बच्चा , जिसने बोलना सीखा था प्रथम शब्द " माँ "
जिस शब्द को समझा पाने का किसी वर्णमाला में न दम हुआ करता था ||

एक बच्चा , जब कोशिश करता क़दम धरने की ज़मीं पे 
बार बार गिरते देख जिसकी माँ के दिल में कंपकंपी सा हुआ करता था ||

एक बच्चा , आंखो में काजल और हाथों में जिसे पकड़ाती थी माँ मुरली 
जिसमें बसते थे प्राण ,माँ के लिए ज़ो "कान्हा" का अक्स हुआ करता था ||

एक बच्चा , क़दम पहला पड़ा था ज़मीं पें ज़ब उसका 
माँ की खुशी , जैसे प्यासे को नसीब अमृतपान हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसे यक़ीन था मोहब्बत के अंधी होने का 
उसे देखने से पहले भी माँ को उससे प्यार ज़ो हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसका मज़हब था सिर्फ उसकी "माँ "
माँ ही मक्का , माँ मदीना ,माँ चारों धाम हुआ करता था ||

एक बच्चा , ज़ो चूम लेता था माँ के हर कदम को मिट्टी पें 
पर मिट्टी खाने की गलतफहमी में , ज़ो डांट का शिकार हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसे शहद और शक्कर कहते "हम हैं सबसे मीठे "
"तब तुमने मेरी माँ को नहीं देखा " ये जिसका जवाब हुआ करता था ||

एक बच्चा ,जिसे अता हैं शोहरत ए जिंदगी उस " माँ " की दुआओं की बदौलत ,
आज़ भी करता हूँ उस विधाता की ज़िंदा प्रतिमूर्ति ,परम शक्ति की साधना ज़ो मेरा मेहताब हुआ करता था ||

|| मनसा ||


फिर हसीन बचपन में जाने का मन करता हैं




आज मेरा फिर हसीन बचपन में जाने का मन करता हैं ।
वो  झूमने , हंसने , खिलखिलाने  का  मन  करता  हैं ।।
नानी की गोद मॆं सोके लोरिया-लाड पाने को मन करता हैं ।
दादा की उंगली पकड. , वो घूम आने को मन करता हैं ।।
वो पापा की डांट पे मम्मी से शिकायत का मन करता हैं ।
इस भागदौड.  की ज़िन्दगी में जो गुम सी गई ,
आज़ फिर  उस मासूमियत को पाने का मन करता हैं ।।
आज मेरा फिर हसीन बचपन में जाने का मन करता हैं ।।

                                                       बारिश  के पानी  में कश्तियां  चलाने को  मन  करता  हैं ।
                                                       लम्बा बांस लेके उड.ती हसीन पंतगे चुराने को मन करता हैं ।।
                                                       वो  हाथों  पे  डॉलर  और झूल्ली  बनाने को  मन करता हैं ।
                                                       गुड्डे- गुड्डियों के खेल में उनका ब्याह रचाने को मन करता हैं ।।
                                                       बिना खलिश और मैल के होते थे दिल तब ,
                                                       आज  उन  खुशियों  को  फिर  से पाने  का मन  करता  हैं ।।
                                                       आज  मेरा  फिर  हसीन  बचपन  में जाने  का मन करता हैं ।।

स्कूल में दोस्तों के संग फिर धमाचौकडी मचाने को मन करता हैं ।
फिर  स्कूल  में  मैडम  को  रिझाने  को  मन  करता  हैं  ।।
आगे वाली छोरी की चोटी पकड. , उसे घुमाने का मन करता हैं ।
आज़ भी याद है उसके रूठने का ढंग,उसे फिर मनाने का मन करता हैं ।।
अब तो टूटे है दिल और अधूरे है सपने ,
इन्हें छोड. फिर बचपन की टूटी पेन्सिल  चलाने का मन करता हैं ।।
आज  मेरा  फिर  हसीन  बचपन  में जाने  का मन करता हैं ।।

                                                          वो गली की आवारगी में फिर शुमार हो जाने का मन करता हैं ।
                                                          वो भोले से चेहरे पे फिर से कूची- कूची पाने का मन करता हैं ।।
                                                          हर शोख हसीना की आशिकी में फिर डूब जाने का मन करता हैं ।
                                                          वो फिर रंग - बिरंग तितलियों के पीछे भागने का मन करता हैं ।।
                                                          वो  बात अलग है मैं जीता हूँ आज़ भी बचपने में ,
                                                          पर  आसपास  भी  बचपन  पाने  का मन  करता  हैं  ।।
                                                          आज  मेरा  फिर हसीन बचपन में जाने का मन करता हैं ।।

                                                            -  मनसा