" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

हुस्न तेरा ए सनम :)



नैनों में बसे उसके चाकू , छुरी , खंजर सारे ,
देख ले बस एक नज़र , तो कत्ल-ए-आम कर जाएँ |

लबों से महज़ छू ही ले वो एक बारगी भी प्याला ,
तो सच्ची , सादा पानी  भी ज़ालिम शराब बन जाएँ ||

अधरों पे चंचल मुस्कान और वो तराशा हुआ साँचा ,
ख़ुद ही समझ जाओगे , परवाना क्यूँ शमा में जल जाएँ |

वो रेशम सी जुल्फें , कुछ अपने में उलझी हुई ,
उलझे उलझे से ख़ुद हम , बस अरमान मचल जाएँ ||

"हुस्न ख़ुद इससे हैं ",तारीफ में और क्या लिखते "मनसा"
ये  तो वो महक हैं , फिज़ाएँ ख़ुद जिससे महकती चली जाएँ ||



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