" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

ताउम्र कोसता रहेगा , हाथ लकीरों को :(


ताउम्र कोसता रहेगा , हाथ यूँ लकीरों को ><
क्यूँ लकीरों को, हाथ में 'वो' रास ना आयी :( 




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