" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

चाटना तो फ़ितरत कुत्तों की हुआ करती हैं


आदमी हैं अगर , तो खुद्दारी से जीना सीख ,
चाटना तो फ़ितरत कुत्तों की हुआ करती हैं ||