" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

संसद एक कोठा, जहाँ नाचती हैं भगत की दुल्हन


संसद एक कोठा 
जहाँ नाचती हैं 
भगत सिंह की दुल्हन 
"आज़ादी"
इशारों पे कुछ सफ़ेदपोशों के 
पहन कपड़े संविधान के 
" पारदर्शी - नग्न से "
खेलते हैं पैसे, मनमर्ज़ी 
उसके देह के भूगोल से 
बस कहीं नीलाम न हो 
' सरेआम ' इज्ज़त उसकी 
इसलिए 
शिखंडी आवाम 
अपनी आंखो पे पट्टी बांध जाती हैं
सुनती हैं बस कानों से 
आवाज़ उसके पैरों के घूँघरू की  
और खुश रहती हैं 
कि आज़ादी जिंदा हैं अभी   |
और आजाद हैं हम अभी  ||

|| मनसा ||