" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

संसद एक कोठा, जहाँ नाचती हैं भगत की दुल्हन


संसद एक कोठा 
जहाँ नाचती हैं 
भगत सिंह की दुल्हन 
"आज़ादी"
इशारों पे कुछ सफ़ेदपोशों के 
पहन कपड़े संविधान के 
" पारदर्शी - नग्न से "
खेलते हैं पैसे, मनमर्ज़ी 
उसके देह के भूगोल से 
बस कहीं नीलाम न हो 
' सरेआम ' इज्ज़त उसकी 
इसलिए 
शिखंडी आवाम 
अपनी आंखो पे पट्टी बांध जाती हैं
सुनती हैं बस कानों से 
आवाज़ उसके पैरों के घूँघरू की  
और खुश रहती हैं 
कि आज़ादी जिंदा हैं अभी   |
और आजाद हैं हम अभी  ||

|| मनसा ||




वो आँखें !!




कमली, पर क़ातिल-कयामत सी हैं वो आँखें 
सुनते हैं, मोती उनके शहर भर में कहर बरपाये बैठे हैं ||

जब से देखी हैं, मदहोश, मय-मतवाली सी वो आँखें 
सुनते हैं, नशे में मयखाने तक खुद को ताला लगाए बैठे हैं  ||

वो काली काली, कजरारी, काले बादल सी जो आँखें 
सुनते हैं, संन्यासी तक के मन कालिख पुताये बैठे हैं  ||

 शबनमी, शरबती, शिउली के पानी सी वो आँखें 
सुनते हैं, भँवरे हजारों इन्हें पीने को ललचाये बैठे हैं || 

 पिनाकिनी, पारुली, पतझड़ में बहार सी है वो आँखें 
सुनते हैं, लोग कई इन्हें जीने का सबब बनाए बैठे हैं ||

जन्नत हैं धरती पे अगर कहीं, तो बस दो जगह ,
एक तो 'मनसा' पता हैं, माँ के आँचल में ,
सुनते हैं, दुजी वो अपनी अँखियों में छुपाये बैठे हैं ||




मोहब्बत में बस जीत की जिद ...


मोहब्बत में बस जीत की जिद पे ही ना अड़े हम 'मनसा' |
हार भी मंजूर हैं , बशर्ते वो अपने हाथों से हमें पहनायें  ||