" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

किसी और की हो नहीं पाएगी वो ||



मुझे भूलने का दावा कर रही  ,
मगर मेरे वज़ूद को अपने में खो नहीं पाएगी वो ||

मेरी पागलों सी दीवानगी पे हँस रही ,
मगर रात को नैनों में लिए अश्क़ सो नहीं पाएगी वो ||

मुझसे दूर जाने को बेताब दिख रही ,
मगर फिर खुशियों को अपने संग पिरो नहीं पाएगी वो ||

"शायद किस्मत को यही मंजूर" कह रही ,
मगर अपनी लकीरों से मेरा प्यार धो नहीं पाएगी वो ||

"मुझे नहीं मालूम , क्या मज़बूरी , क्या शिकायत हैं उसको मुझसे "

बस मुझे खबर हैं अपनी मोहब्बत से इतनी ,
मुझसे ज़ुदा होके  किसी और की हो नहीं पाएगी वो ||


    || मनसा || 



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