" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

आत्महत्या : एक नाकाम कोशिश


आत्महत्या 
एक नाकाम कोशिश 
तकलीफ़े पीछे छोड़ने की । 
एक कायर कहानी 
दुनिया से मुँह मोड़ने की 
एक खुदगर्ज़ी 
अपनों को बीच राह छोड़ने की ॥ 

 अब काश कोई इन अभागों को समझा पाये 
यूँ दर्द से राहत नहीं मिला करती ,
राहत नाम एक एहसास का हैं 
जो महसूस करने को आदमी, ज़िंदा जरुरी हैं ॥ 
कभी देखा हैं किसी मुर्दे को चैन की साँस लेते हुए ?

मौत को यूँ चूम कर 
पाने जाते हो नयी सुबह 
क्या सोच के ,
 अगली जंग तुम्हें आसान मिल जाएगी ?

ये झूला 
कभी दर्द नहीं छीन पाता । 
अगर कुछ छीन पाता हैं तो बस ,
 बेबस माँ के चेहरे पे हँसी । 
दे पाता हैं कुछ तो बस
लाचार बाप की आँखों में नमी   ॥ 
कन्धा से कन्धा ढूँढता हैं भाई  
बहन याद करती हैं राखी वाली कलाई ॥ 
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 अंत में, 
फ़िर भी
अगर फैसला अपना 
सही लगा हैं तुमको भाई 
तो शायद सच में बदकिस्मत थी, वो माई 
जिसने जिण कर तुम्हें, अपनी कोख़ लजाई ॥