" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

'मोहब्बत' पेशा नहीं होता


  वो बेवफा आज फिर लौट आई हैं मुझमें ही सिमट जाने को |
  अरे कोई उस नादाँ को समझाए ,'मोहब्बत' पेशा नहीं होता ||



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