" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

मैं , मेरा बचपन और मेरी माँ || (^_^) ||







ज़ब कभी मैं फुर्सत के पलों में शीशा देखता हूँ |
अपने अक्स में खिलखिलाते एक बच्चे को देखता हूँ ||

एक बच्चा , जिसने बोलना सीखा था प्रथम शब्द " माँ "
जिस शब्द को समझा पाने का किसी वर्णमाला में न दम हुआ करता था ||

एक बच्चा , जब कोशिश करता क़दम धरने की ज़मीं पे 
बार बार गिरते देख जिसकी माँ के दिल में कंपकंपी सा हुआ करता था ||

एक बच्चा , आंखो में काजल और हाथों में जिसे पकड़ाती थी माँ मुरली 
जिसमें बसते थे प्राण ,माँ के लिए ज़ो "कान्हा" का अक्स हुआ करता था ||

एक बच्चा , क़दम पहला पड़ा था ज़मीं पें ज़ब उसका 
माँ की खुशी , जैसे प्यासे को नसीब अमृतपान हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसे यक़ीन था मोहब्बत के अंधी होने का 
उसे देखने से पहले भी माँ को उससे प्यार ज़ो हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसका मज़हब था सिर्फ उसकी "माँ "
माँ ही मक्का , माँ मदीना ,माँ चारों धाम हुआ करता था ||

एक बच्चा , ज़ो चूम लेता था माँ के हर कदम को मिट्टी पें 
पर मिट्टी खाने की गलतफहमी में , ज़ो डांट का शिकार हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसे शहद और शक्कर कहते "हम हैं सबसे मीठे "
"तब तुमने मेरी माँ को नहीं देखा " ये जिसका जवाब हुआ करता था ||

एक बच्चा ,जिसे अता हैं शोहरत ए जिंदगी उस " माँ " की दुआओं की बदौलत ,
आज़ भी करता हूँ उस विधाता की ज़िंदा प्रतिमूर्ति ,परम शक्ति की साधना ज़ो मेरा मेहताब हुआ करता था ||

|| मनसा ||


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