" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

...क्या मुझे प्यार का सलीका भी नहीं आया था ???



जब उसने कहा था मुझसे , मैं चाहती हूँ किसी और को ,
"तुम्हारी खुशी सबसे ऊपर है मेरे लिए" शब्द बस इत्ते ही निकाल पाया था |

लिखा था उसका नाम कमरे के हर कोने में , चूमता था हरदिन उन्हे ,
गम की उस रात , मैंने हर नाम को चूम चूम के मिटाया था ||

कल शादी थी उसकी , बुलाया नहीं था उसने , मैं गया फिर भी ,
जिन हाथों से देता था तोहफा , उन्हीं से बरातियों का सोफा सजा के आया था ||

मुझे तो गिला भी नहीं की आज उसे मैं याद भी न रहा ,
उसकी मोहब्बत में , मैं भी तो सारे जहाँ को भुला के आया था ||

उससे तो मैं बेवफाई का हिसाब माँगने क़ाबिल भी न हो सका ,
उसके इश्क़ के आगोश में , मैं भी तो कई दिल तोड़ के आया था ||

बस एक ख़याल ने उसकी मोहब्बत में ज़ान फ़ना होने से बचा ली ,
उसे शायद मिल जाए दूजा ,पर माँ को मैं बड़ी मन्नतों से मिल पाया था ||

जिनकी चाह था मैं ,उन अपनों को छोड़ भागा था मैं उस गैर के पीछे ,
लोग कहते हैं ," मनसा " तूझे तो प्यार का सलीका भी नहीं आया था ||

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