" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

भगत ऐसे, इस मिट्टी पे बड़े निराले हुआ करते हैं ।।



मिलेंगे यूँ तो गली गली भक्त मिटटी के पुतलों के,
पर मिट्टी की खातिर जो खुद मिट्टी मिल जायें,
भगत ऐसे, इस मिट्टी पे बड़े निराले हुआ करते हैं ।।

जन्मदिन मुबारक़ हो , शहीद ए आज़म !! 




काश वजह देशभक्ति रही होती !!



देखता हूँ बच्चों को तिरंगा बेचते रास्तों पे,
काश वजह भूख नहीं, देशभक्ति रही होती ।।




आत्महत्या : एक नाकाम कोशिश


आत्महत्या 
एक नाकाम कोशिश 
तकलीफ़े पीछे छोड़ने की । 
एक कायर कहानी 
दुनिया से मुँह मोड़ने की 
एक खुदगर्ज़ी 
अपनों को बीच राह छोड़ने की ॥ 

 अब काश कोई इन अभागों को समझा पाये 
यूँ दर्द से राहत नहीं मिला करती ,
राहत नाम एक एहसास का हैं 
जो महसूस करने को आदमी, ज़िंदा जरुरी हैं ॥ 
कभी देखा हैं किसी मुर्दे को चैन की साँस लेते हुए ?

मौत को यूँ चूम कर 
पाने जाते हो नयी सुबह 
क्या सोच के ,
 अगली जंग तुम्हें आसान मिल जाएगी ?

ये झूला 
कभी दर्द नहीं छीन पाता । 
अगर कुछ छीन पाता हैं तो बस ,
 बेबस माँ के चेहरे पे हँसी । 
दे पाता हैं कुछ तो बस
लाचार बाप की आँखों में नमी   ॥ 
कन्धा से कन्धा ढूँढता हैं भाई  
बहन याद करती हैं राखी वाली कलाई ॥ 
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 अंत में, 
फ़िर भी
अगर फैसला अपना 
सही लगा हैं तुमको भाई 
तो शायद सच में बदकिस्मत थी, वो माई 
जिसने जिण कर तुम्हें, अपनी कोख़ लजाई ॥ 




चाटना तो फ़ितरत कुत्तों की हुआ करती हैं


आदमी हैं अगर , तो खुद्दारी से जीना सीख ,
चाटना तो फ़ितरत कुत्तों की हुआ करती हैं ||
 
 


संसद एक कोठा, जहाँ नाचती हैं भगत की दुल्हन


संसद एक कोठा 
जहाँ नाचती हैं 
भगत सिंह की दुल्हन 
"आज़ादी"
इशारों पे कुछ सफ़ेदपोशों के 
पहन कपड़े संविधान के 
" पारदर्शी - नग्न से "
खेलते हैं पैसे, मनमर्ज़ी 
उसके देह के भूगोल से 
बस कहीं नीलाम न हो 
' सरेआम ' इज्ज़त उसकी 
इसलिए 
शिखंडी आवाम 
अपनी आंखो पे पट्टी बांध जाती हैं
सुनती हैं बस कानों से 
आवाज़ उसके पैरों के घूँघरू की  
और खुश रहती हैं 
कि आज़ादी जिंदा हैं अभी   |
और आजाद हैं हम अभी  ||

|| मनसा ||




वो आँखें !!




कमली, पर क़ातिल-कयामत सी हैं वो आँखें 
सुनते हैं, मोती उनके शहर भर में कहर बरपाये बैठे हैं ||

जब से देखी हैं, मदहोश, मय-मतवाली सी वो आँखें 
सुनते हैं, नशे में मयखाने तक खुद को ताला लगाए बैठे हैं  ||

वो काली काली, कजरारी, काले बादल सी जो आँखें 
सुनते हैं, संन्यासी तक के मन कालिख पुताये बैठे हैं  ||

 शबनमी, शरबती, शिउली के पानी सी वो आँखें 
सुनते हैं, भँवरे हजारों इन्हें पीने को ललचाये बैठे हैं || 

 पिनाकिनी, पारुली, पतझड़ में बहार सी है वो आँखें 
सुनते हैं, लोग कई इन्हें जीने का सबब बनाए बैठे हैं ||

जन्नत हैं धरती पे अगर कहीं, तो बस दो जगह ,
एक तो 'मनसा' पता हैं, माँ के आँचल में ,
सुनते हैं, दुजी वो अपनी अँखियों में छुपाये बैठे हैं ||




मोहब्बत में बस जीत की जिद ...


मोहब्बत में बस जीत की जिद पे ही ना अड़े हम 'मनसा' |
हार भी मंजूर हैं , बशर्ते वो अपने हाथों से हमें पहनायें  ||