" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

तेरी बात और हैं ...



...यूँ तो जाम पेशगी को, हजारों मयखाने और हैं ।
पर तू जो निगाहों से पिलाएँ, तो तेरी बात और हैं ॥