" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

मोहब्बत में बस जीत की जिद ...


मोहब्बत में बस जीत की जिद पे ही ना अड़े हम 'मनसा' |
हार भी मंजूर हैं , बशर्ते वो अपने हाथों से हमें पहनायें  ||



0 comments: