" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

वो आँखें !!




कमली, पर क़ातिल-कयामत सी हैं वो आँखें 
सुनते हैं, मोती उनके शहर भर में कहर बरपाये बैठे हैं ||

जब से देखी हैं, मदहोश, मय-मतवाली सी वो आँखें 
सुनते हैं, नशे में मयखाने तक खुद को ताला लगाए बैठे हैं  ||

वो काली काली, कजरारी, काले बादल सी जो आँखें 
सुनते हैं, संन्यासी तक के मन कालिख पुताये बैठे हैं  ||

 शबनमी, शरबती, शिउली के पानी सी वो आँखें 
सुनते हैं, भँवरे हजारों इन्हें पीने को ललचाये बैठे हैं || 

 पिनाकिनी, पारुली, पतझड़ में बहार सी है वो आँखें 
सुनते हैं, लोग कई इन्हें जीने का सबब बनाए बैठे हैं ||

जन्नत हैं धरती पे अगर कहीं, तो बस दो जगह ,
एक तो 'मनसा' पता हैं, माँ के आँचल में ,
सुनते हैं, दुजी वो अपनी अँखियों में छुपाये बैठे हैं ||




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