" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

23rd मार्च : मेरी मौत का दिन

                                
23rd मार्च
मेरी मौत का दिन |
तथाकथित
'शहीद दिवस"
आज़ मेरी तस्वीर
से धूल हटाई जाएगी|
फिर मालाएँ पहनाई जाएगी !
लोग ऊपरी मन से मेरी तारीफ करेंगें |
मुझे अपना आदर्श कहेंगें !!
रेलियाँ निकाली जाएगी |
आज़ादी मेरी दुल्हन बताई जाएगी  |
मेरे नाम के नारें लगेंगें !
दो चार कवितायें लिखी जाएगी |
 कुछ गाने गाएँ जाएंगे |
और फिर कल
कल ...
वो तस्वीर
किसी कचरे के ढेर में पड़ी होगी !
 सूअर मुंह मार रहा होगा |
 बच्चे उसपे मूत रहे होंगे |
मेरी दुल्हन की इज्ज़त कहीं लुट रही होगी |
और किसी को कोई परवाह नहीं रही होगी|

'परवाह' तो मुझे भी नहीं
पर इतना ध्यान रखना
अगर यूँ ही तुम ,बस
शहादतों पे
औपचारिकता
निभाते चले जाओगे ,
तो.....
उन गोरो का सूरज तो डूबा दिया हमने !
पर काले अंग्रेजो से निपटने वाले
दुसरे "शहीद "
नहीं ढूंढ पाओगे  ।।

:(   :(   :(   :(   :(   :(   :(




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