नैनों में बसे उसके चाकू , छुरी , खंजर सारे ,
देख ले बस एक नज़र , तो कत्ल-ए-आम कर जाएँ |
लबों से महज़ छू ही ले वो एक बारगी भी प्याला ,
तो सच्ची , सादा पानी भी ज़ालिम शराब बन जाएँ ||
अधरों पे चंचल मुस्कान और वो तराशा हुआ साँचा ,
ख़ुद ही समझ जाओगे , परवाना क्यूँ शमा में जल जाएँ |
वो रेशम सी जुल्फें , कुछ अपने में उलझी हुई ,
उलझे उलझे से ख़ुद हम , बस अरमान मचल जाएँ ||
"हुस्न ख़ुद इससे हैं ",तारीफ में और क्या लिखते "मनसा"
ये तो वो महक हैं , फिज़ाएँ ख़ुद जिससे महकती चली जाएँ ||
.jpg)